डलमऊ के शायर शादाब अंजुम अपनी ग़ज़लों से बटोर रहे हैं पहचान

डलमऊ (रायबरेली)। साहित्य और शायरी की दुनिया में डलमऊ के चौहट्टा मोहल्ले के रहने वाले शादाब अंजुम ने कम उम्र में ही अपनी एक अलग पहचान बना ली है। मोहम्मद फारूक के पुत्र शादाब लफ़्ज़ों के बेहद अच्छे जानकार हैं, और उनकी ग़ज़लों में एहसास, रवानी और गहराई झलकती है। उनके उस्तादे मोहतरम जनाब दानिश रायबरेलवी साहब हैं, जिनकी रहनुमाई में उन्होंने शायरी की बारीकियों को निखारा है।डलमऊ महोत्सव में स्थानीय प्रतिभाओं ने अपने हुनर का शानदार प्रदर्शन किया, वहीं चौहट्टा निवासी युवा शायर शादाब अंजुम ने अपनी ग़ज़ल पेश कर पूरे पंडाल से वाहवाही लूटी। जब उन्होंने ये अशआर पढ़े—“बे साया हुआ हूं शजर तो हूं मगर सूखा हुआ हूं, नहीं हूं बाग़ का मालिक तो क्या ग़म, तिरी खुशबू से तो महका हुआ हूं…”तो पूरा पंडाल तालियों की गूंज से गूंज उठा। शादाब की यह पेशकश श्रोताओं के दिलों में उतर गई और उन्होंने अपनी अद्भुत आवाज़ व एहसास भरे लहजे से सबका दिल जीत लिया।

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