नन्हे कदमों पर महंगाई की मार: प्ले ग्रुप बना पैसों का खेल

शिक्षा या व्यापार: नन्हे कदमों पर महंगाई का बोझ
मेराज अली / न्यूज प्लस रिपोर्ट
देश में शिक्षा व्यवस्था एक अजीब मोड़ पर खड़ी है, जहाँ अब पढ़ाई सेवा कम और महंगा सौदा ज्यादा बनती जा रही है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्ले ग्रुप जैसी शुरुआती शिक्षा, जो बच्चों के मानसिक विकास का पहला चरण होती है, अब अत्यधिक महंगी हो चुकी है। छोटे-छोटे बच्चों के नाम पर अभिभावकों से भारी भरकम फीस वसूली जा रही है, जिससे मध्यम और गरीब वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
निजी स्कूलों की चमक-दमक के पीछे एक कड़वा सच छिपा है। एडमिशन फीस से लेकर हर गतिविधि के नाम पर अलग-अलग शुल्क वसूले जाते हैं। आधुनिक सुविधाओं और अंग्रेजी माध्यम की आड़ में फीस को उचित ठहराया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि शिक्षा अब एक लाभकारी व्यवसाय में बदलती जा रही है।
वहीं दूसरी तरफ, सरकारी स्कूलों की कमजोर स्थिति लोगों के पास विकल्प कम कर देती है। बुनियादी सुविधाओं की कमी, शिक्षण गुणवत्ता में गिरावट और अंग्रेजी शिक्षा का अभाव अभिभावकों को निजी स्कूलों की ओर धकेलता है। नतीजा यह होता है कि कई परिवार अपनी आय से अधिक खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं।
इस असंतुलन ने समाज में शिक्षा के आधार पर गहरी खाई बना दी है। एक वर्ग बेहतर सुविधाओं के साथ आगे बढ़ रहा है, जबकि दूसरा वर्ग पीछे छूटता जा रहा है।
जरूरी है कि सरकार शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए। सरकारी स्कूलों को आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण बनाना समय की मांग है, ताकि हर वर्ग के बच्चों को समान अवसर मिल सके। शिक्षा को व्यापार नहीं, अधिकार के रूप में स्थापित करना ही इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।

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