आज जब नेताओं और बड़े अधिकारियों के बीच वीआईपी कल्चर हावी होता जा रहा है, ऐसे समय में देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी जैसे सरल, सादगीप्रिय और ईमानदार नेताओं को याद करना जरूरी हो जाता है।कहानी उस समय की है जब शास्त्री जी रेल मंत्री थे। लेकिन उन्होंने कभी अपनी मां को यह नहीं बताया था कि वे मंत्री बन चुके हैं। वे केवल इतना ही कहते—
“मैं रेलवे में नौकरी करता हूं।”एक दिन शास्त्री जी किसी कार्यक्रम में रेलवे भवन पहुंचे। उसी दौरान उनकी मां भी अपने बेटे को खोजते हुए वहीं आ गईं। उन्होंने लोगों से कहा कि उनका बेटा भी यहीं काम करता है। जब लोगों ने नाम पूछा और उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री बताया, तो सभी हैरान रह गए। सुरक्षा अधिकारी ने तो यहां तक कहा—
“आप मज़ाक कर रही हैं, आप मंत्री की मां कैसे हो सकती हैं?”लेकिन जब उन्हें शास्त्री जी के सामने ले जाया गया, तो मां ने तुरंत अपने बेटे को पहचान लिया—
“हाँ, यही मेरा बेटा है।”लोगों ने शास्त्री जी से पूछा कि क्या यह आपकी मां हैं?शास्त्री जी ने आदरपूर्वक उन्हें अपने पास बिठाया, हाल-चाल लिया और फिर विनम्रता से घर भेज दिया।कार्यक्रम के बाद पत्रकारों ने पूछा—
“आपने अपनी माँ के सामने भाषण क्यों नहीं दिया?”शास्त्री जी का जवाब सुनकर सब स्तब्ध रह गए।
उन्होंने कहा—
“मेरी मां को नहीं पता कि मैं मंत्री हूं। अगर उन्हें पता चल गया तो वे लोगों की सिफ़ारिशें करना शुरू कर देंगी, और मैं उन्हें मना भी नहीं कर पाऊंगा। इससे उनमें अहंकार भी आ जाएगा, और मैं यह नहीं होने देना चाहता।”यह सुनकर सभी लोग उनके सत्य, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा के कायल हो गए।
जब सादगी थी पहचान: लाल बहादुर शास्त्री की जीवन से सीख
