तारीख के औराक़ (पन्नों) में फतह और शिकस्त की अनगिनत दास्तानें दफ़्न हैं, लेकिन 61 हिजरी में कर्बला की तपती सरज़मीन पर जो माशरा (घटना) पेश आया, वह महज़ एक जंग नहीं बल्कि इंसानियत के वजूद का सबसे अज़ीम इम्तिहान था। एक तरफ यज़ीदी हुकूमत का ज़ुल्म, तशद्दुद (हिंसा) और हज़ारों का लश्कर था, तो दूसरी तरफ इमाम हुसैन (अै) के साथ महज़ चंद जाँबाज़, जो हक़ और उसूलों की खातिर सिपर (ढाल) बनकर खड़े थे। इस पूरे तारीखी पस-मंज़र (पृष्ठभूमि) में हज़रत अब्बास बिन अली (अै) का किरदार वफ़ादारी, ईसार (त्याग) और शहादत की उस मेराज (ऊंचाई) को छूता है, जिसकी नज़ीर (मिसाल) पूरी कशिश-ए-इंसानियत में ढूँढना ना-मुमकिन है।
अय्याम-ए-मुहर्रम (मुहर्रम के दिनों) की उस सालेह-सोज़ (झुलसाने वाली) गर्मी में जब बहरे-फ़ुरात (फ़ुरात नदी) के पानी पर पहरा बिठाकर मासूम बच्चों को तशना-काम (प्यासा) तड़पाया जा रहा था, तब ‘कमर-ए-बनी हाशिर’ हज़रत अब्बास (अै) ने सब्र-ओ-इस्तकामती और भाई के प्रति अपनी अक़ीदत (श्रद्धा) का जो नायाब बाब (अध्याय) रक़म किया, वह आज भी हर हस्सास (संवेदनशील) दिल को लहू के आँसू रुला देता है। दस्त-ए-मुबारक (पवित्र हाथ) में अलम-ए-हुसैनी थामे जब वे अतश-ज़दा (प्यासे) मासूमों की ख़ातिर आदा (दुश्मनों) की सफ़ों (कतारों) को चीरते हुए फ़ुरात के साहिल पर पहुँचे, तो लबरेज़ पानी हाथ में लेकर भी उसे वापस दरिया की लहरों को सुपुर्द कर दिया। बेइंतहा तशनगी (प्यास) के बावजूद मौला हुसैन (अै) से पहले खुद पानी न पीने का यह फ़ैसला रूहानी ईसार की सबसे अज़ीम अलामत (प्रतीक) बन गया।
तनाव-ओ-तशद्दुद के बीच अपने दोनों बाज़ू कट जाने और मश्कीज़ा तीरों से छलनी होने के बाद भी आपके इस्तेक़लाल (दृढ़ता) में अद्ना सा तज़लज़ुल (कमजोरी) न आया। हज़रत अब्बास (अै) की शहादत पर इमाम हुसैन (अै) का यह फरमाना कि “अब मेरी कमर टूट गई,” इस हक़ीक़त की गवाही है कि वह अलमदार सिर्फ एक सिपहसालार नहीं, बल्कि अहल-ए-बैत (इमाम के परिवार) की ज़ीनत और उम्मीदों का मरकज़ (केंद्र) थे। सदियाँ गुज़र गईं, फ़ुरात आज भी रवां-दवां है, लेकिन गाज़ी अब्बास (अै) का अलम आज भी दुनिया भर के मज़लूमों के लिए ज़ुल्म के खिलाफ़ डटे रहने और हक़-परस्ती के लिए जां-निसार करने का एक मुस्तक़िल (स्थायी) सरचश्मा-ए-हिदायत है।
